अगर बचपन से ले के आजतक अपनी स्मृतिया समेटने का प्रयास करू तो मुझे याद भी नहीं कि शुरुआत कहाँ से करनी होगी ,
बचपन जिंदगी का वो सबसे हसीन पन्ना होता है जिसमे अंकित सारी स्मृतिया शायद जिंदगी में कभी मिट नहीं सकती , बाल ह्रदय इतना निश्छल
होता है ,न कोई चिंता ,न भविष्य कि चिंता ,सिर्फ अपने आप में मगन ,अपनी दुनिया में मस्त , कितना खूबसूरत एहसास होता है बचपन भी.
आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर बचपन के वो दिन बहुत शिद्द्त के साथ याद आते हैं . बचपन में न तो किसी कि चिंता और न ही ये सोचना
कि आगे क्या करना है, बस एक मासूमियत और उसमे बसा अपना संसार , तब तो पिता का डांटना , माँ कि झिडकी सब खराब सी लगती थी.
आज जब अपने बेटे को उन्ही सब बातों के लिए टोंकता हूँ तो जैसे सारी बाते चलचित्र कि तरह सामने घूमने लगती है फिर याद आने लगता है कि वो
पिता का डांटना ,माँ की झिडकी कितनी जरुरी थी , शायद उन्ही बातों का नतीजा था कि मै आज वो हूँ , जो भी बना वो सब उन्ही का दिया
हुआ था , उन्ही का है और वो स्मृतिया वो हमेशा जेहन में अंकित रहेंगी.
एक छोटी सी बात इस सन्दर्भ में याद आती है " एक बार पिता ने अपने बेटे को अपनी कार पर कुछ स्क्रेत्च करते देखा फिर क्या था
उसकी पिटाई हो गयी ,बाद में पिता ने कार में देखा तो वह लिखा था I LOVE YOU DADDY, " अब शर्मिंदा होने की बारी पिता की
थी , इसका मतलब ये हुआ कि चीजे इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितने रिश्ते ,
बिना सोचे समझे किसी चीज़ को कह देना , फिर बाद में अपने ही शब्दों पर पछताना , पर ये होता है और अक्सर ही होता है ,पर
एहसास नहीं होता , क्यूंकि आज हम इतने भौतिकता वादी हो गए है कि हम रिश्तों में भी उसी भौतिकतावाद को ढूंडते रहते है , कसूर
हमारा नहीं है आज की जीवन पध्दति का है जो इतनी तेज हो गयी है किस जिसमे हमे क्या पीछे छुट गया ये भी विचार करने की आज़ादी
भी नहीं देती है , और आप जब विचार करने कि स्थिति में होते है ,तब शायद इतने दूर आ चुके होते है ,कि उन बातो का कोई फ़ायदा
नहीं रह जाता .
पर कभी कभी सोचता हूँ कि ये सब क्यों , जिंदगी की आपाधापी में अपने लिए ,अपनों के लिए , अपनापन कहाँ खोता जा रहा है
फिर से उन्ही भूली हुई स्म्रतियो को समेटने कि जरुरत है ,अपने वो भूलते हुए संस्कार , एक सामूहिक परिवार के साथ रहने का सुख ,
सब कुछ पीछे छुटता जा रहा है शायद . ...........
धीरेन्द्र मोहन श्रीवास्तव
लखनऊ
दिनांक : ३१ अगस्त २०११
समय : ८.४५ रात्रि
बचपन जिंदगी का वो सबसे हसीन पन्ना होता है जिसमे अंकित सारी स्मृतिया शायद जिंदगी में कभी मिट नहीं सकती , बाल ह्रदय इतना निश्छल
होता है ,न कोई चिंता ,न भविष्य कि चिंता ,सिर्फ अपने आप में मगन ,अपनी दुनिया में मस्त , कितना खूबसूरत एहसास होता है बचपन भी.
आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर बचपन के वो दिन बहुत शिद्द्त के साथ याद आते हैं . बचपन में न तो किसी कि चिंता और न ही ये सोचना
कि आगे क्या करना है, बस एक मासूमियत और उसमे बसा अपना संसार , तब तो पिता का डांटना , माँ कि झिडकी सब खराब सी लगती थी.
आज जब अपने बेटे को उन्ही सब बातों के लिए टोंकता हूँ तो जैसे सारी बाते चलचित्र कि तरह सामने घूमने लगती है फिर याद आने लगता है कि वो
पिता का डांटना ,माँ की झिडकी कितनी जरुरी थी , शायद उन्ही बातों का नतीजा था कि मै आज वो हूँ , जो भी बना वो सब उन्ही का दिया
हुआ था , उन्ही का है और वो स्मृतिया वो हमेशा जेहन में अंकित रहेंगी.
एक छोटी सी बात इस सन्दर्भ में याद आती है " एक बार पिता ने अपने बेटे को अपनी कार पर कुछ स्क्रेत्च करते देखा फिर क्या था
उसकी पिटाई हो गयी ,बाद में पिता ने कार में देखा तो वह लिखा था I LOVE YOU DADDY, " अब शर्मिंदा होने की बारी पिता की
थी , इसका मतलब ये हुआ कि चीजे इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितने रिश्ते ,
बिना सोचे समझे किसी चीज़ को कह देना , फिर बाद में अपने ही शब्दों पर पछताना , पर ये होता है और अक्सर ही होता है ,पर
एहसास नहीं होता , क्यूंकि आज हम इतने भौतिकता वादी हो गए है कि हम रिश्तों में भी उसी भौतिकतावाद को ढूंडते रहते है , कसूर
हमारा नहीं है आज की जीवन पध्दति का है जो इतनी तेज हो गयी है किस जिसमे हमे क्या पीछे छुट गया ये भी विचार करने की आज़ादी
भी नहीं देती है , और आप जब विचार करने कि स्थिति में होते है ,तब शायद इतने दूर आ चुके होते है ,कि उन बातो का कोई फ़ायदा
नहीं रह जाता .
पर कभी कभी सोचता हूँ कि ये सब क्यों , जिंदगी की आपाधापी में अपने लिए ,अपनों के लिए , अपनापन कहाँ खोता जा रहा है
फिर से उन्ही भूली हुई स्म्रतियो को समेटने कि जरुरत है ,अपने वो भूलते हुए संस्कार , एक सामूहिक परिवार के साथ रहने का सुख ,
सब कुछ पीछे छुटता जा रहा है शायद . ...........
धीरेन्द्र मोहन श्रीवास्तव
लखनऊ
दिनांक : ३१ अगस्त २०११
समय : ८.४५ रात्रि
it is osam
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