Thursday, 3 November 2011

मीठा बोले और खुश रहे

कभी समय निकाल कर अपने आप से संबोधित होने की कोशिश की है आपने , शायद नहीं , जिंदगी की व्यस्तताओं में अपने अंदर देखने का समय ही नहीं रहता , या यूँ कहना ज्यादा उचित होगा कि हम देखना ही नहीं चाहते या देखने से डरते है ,हम डरते है अपने भविष्य से , अपने आप से ,
   फिर भी समय मिले तो अपने अंदर झंकियेगा जरुर और पूछियेगा अपने आप से कि अभी तक आपने क्या खोया है और क्या पाया है ,क्या आप अपने वर्तमान से संतुष्ट है ,अगर आप अपने वर्तमान से संतुष्ट है तो इसका मतलब ये हुआ कि आप अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने की इच्छा शक्ति का अभाव हो रहा है , क्यूंकि याद रखिये कि असंतोष ही उन्नति का मूल है और अगर आप संतुष्ट हो गए तो आपने अपने लिए आगे बढ़ने के रास्ते बंद कर लिये है , और जिंदगी हमेशा आगे बढते रहने का काम है , रुकना , आराम से चलना ये  आपकी कामयाबी में बाधक हो सकता है ,
                                                        और ये भी सोचियेगा कि आपकी वजह से कभी कोई आपका अपना व्यथित तो नहीं हुआ है क्यूंकि मेरा ये मानना है कि आप किसी को कुछ भी नहीं दे सकते क्यूंकि वो आपके हाँथ में नहीं है पर आप अपनी वाणी से ,अच्छा बोलकर  आप किसी को सबकुछ दे सकते है , तो कुछ भी बोलने से पहले ये जरुर सोचियेगा कि आपकी वजह से किसी को तकलीफ तो नहीं हो रही है , और जिंदगी में ये जरूरी भी है और विनम्रता आपको ही कुछ दे कर जायेगी , तो कोशिश करिये कि नम्र बने और सबसे बड़ी बात कि मनुष्य को अपनी गलती का एहसास जरुर होना चाहिए और किसी के प्रति की गयी गलती के लिए ,अपने कटु शब्दों के लिए , माफ़ी मांगना बड़प्पन की निशानी है
तो बड़े बनिए ,मधुर बोलिए ,और एक सकारातमक वातावरण का निर्माण कीजिये ,

धीरेन्द्र नोहन
लखनऊ ०३-११-२०११

Thursday, 1 September 2011

जिंदगी ,कुछ विचार

जिंदगी क्या है ,क्यों है , और इसका मतलब क्या है , कभी  सोचा है , ये हमे क्यों मिली , और हमने इसका क्या उपयोग किया ,कभी विचार करियेगा . जिंदगी की सार्थकता के बारे में सोचिये , क्या हमने अपनी हर बात में इमानदारी से व्यव्हार किया .अपने आपसे ये प्रश्न पूछते हुए भी डर लगता होगा , जिंदगी में रिश्ते होते है ,प्यार होता है , दोस्त होते है ,दुश्मन होते है , ,लोग रिश्तों में इमानदारी की बात करते है  तो इमानदारी क्या है अगर आपने अपने हर रिश्ते में अपनी सम्पूर्णता दी है तो क्या वो सब कुछ है, नहीं बिलकुल नहीं , कुछ चीज़े  दिल से निकलती है  और वो दिल से ही करने का मन करता है ,अगर आप परिवार वाले है तो अगर अपने अपने परिवार के लिए वो सब जो जरुरी है वो अगर किया है तो वो सार्थक है ,वही इमानदारी है,
पर क्या ये जरुरी है कि हर जगह ,हर बात पर सिर्फ आप अपने आदर्शो पर कायम रहे , और अपनी खुशिया अपने जज्बातों पर काबू रखे, जब तक आपकी वजह से किसी को कोई समस्या नहीं हो रहीहै तो आपको भी हक है थोड़ी उन्मुक्तता,  थोडा खुलापन अपने जीवन में , आज हम इकीसवीं सदी में जी रहे है, इसके साथ हमे अपनी सोच भी बदलनी होगी , जब आप अपनी जिंदगी में कंप्यूटर, मोबाइल फोन , इन सबका उपयोग शुरू कर सकते है ,इन्टरनेट पर web sites के मायाजाल में उलझ सकते है तो फिर अपने विचारों, अपने सोचने के ढंग में भी बदलाव लेन कि जरुरत है .
     बहुत सी बाते होती है जो आपको किसी के बारे में अच्छी लगाती है, और आप कहना भी चाहते है, पर आपकी भावनाओ को शब्दों का सहारा नहीं मिल पाता , और फिर बाद में आप सोचते रह जाते
है कि काश कह दिया होता, उसी तरह अगर आपको किसी के बारे में कोई चीज़ अच्छी नहीं लगती तो फिर वही बात.........
कुछ शब्द याद आते है जो मुझे sms से मिले थे " if u love some one , be brave to tell them otherwise be brave enough to watch them to be loved by someone else "
 आपको अपनी जज्बात, अपनी भावनाओ को शब्दों में परिवर्तित करने कि कला आनी चाहिए , फिर देखिएगा कि आपकी लेखनी कितने बेबाक हो जाती है , और आपके लेखन को एक नयी धार मिल जाती है,

Wednesday, 31 August 2011

बचपन ,कुछ स्मृतियाँ

अगर बचपन से ले के आजतक अपनी स्मृतिया समेटने का प्रयास करू तो मुझे याद भी नहीं कि शुरुआत कहाँ से करनी होगी ,
बचपन जिंदगी का वो सबसे हसीन पन्ना होता है जिसमे अंकित सारी स्मृतिया शायद जिंदगी में कभी मिट नहीं सकती , बाल ह्रदय इतना निश्छल
होता है ,न कोई चिंता ,न भविष्य कि चिंता ,सिर्फ अपने आप में मगन ,अपनी दुनिया में मस्त , कितना खूबसूरत एहसास होता है बचपन भी.
आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर बचपन के वो दिन बहुत शिद्द्त के साथ याद आते हैं . बचपन में न तो किसी कि चिंता और न ही ये सोचना
कि आगे क्या करना है, बस एक मासूमियत और उसमे बसा अपना संसार , तब तो पिता का डांटना , माँ कि झिडकी सब खराब सी लगती थी.
आज जब अपने बेटे को उन्ही  सब बातों के लिए टोंकता हूँ तो जैसे सारी बाते चलचित्र कि तरह सामने घूमने लगती है फिर याद आने लगता है कि वो
पिता का डांटना ,माँ की झिडकी कितनी जरुरी थी , शायद उन्ही बातों का नतीजा था कि मै आज वो हूँ , जो भी बना वो सब उन्ही का दिया
हुआ था , उन्ही का है और वो स्मृतिया वो हमेशा जेहन में अंकित रहेंगी.
    एक छोटी सी बात इस सन्दर्भ में याद आती है " एक बार पिता ने अपने बेटे को अपनी कार पर कुछ स्क्रेत्च करते देखा फिर क्या था
उसकी पिटाई हो गयी ,बाद में पिता ने कार में देखा तो वह लिखा था I LOVE YOU DADDY, " अब शर्मिंदा होने की बारी पिता की
थी , इसका मतलब ये हुआ कि चीजे इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितने रिश्ते     ,
  बिना सोचे समझे किसी चीज़ को कह देना , फिर बाद में अपने ही शब्दों पर पछताना , पर ये होता है और अक्सर ही होता है ,पर
एहसास नहीं होता , क्यूंकि आज हम इतने भौतिकता वादी हो गए है कि हम रिश्तों में भी उसी भौतिकतावाद को ढूंडते रहते है , कसूर
हमारा नहीं है आज की जीवन पध्दति का है जो इतनी तेज हो गयी है किस जिसमे हमे क्या पीछे छुट गया ये भी विचार करने की आज़ादी
भी नहीं देती है , और आप जब विचार करने कि स्थिति में होते है ,तब शायद इतने दूर आ चुके होते है ,कि उन बातो का कोई फ़ायदा
नहीं रह जाता .

पर कभी कभी सोचता हूँ कि ये सब क्यों , जिंदगी की आपाधापी में अपने लिए ,अपनों के लिए , अपनापन कहाँ खोता जा रहा है
फिर से उन्ही भूली हुई स्म्रतियो को समेटने कि जरुरत है ,अपने वो भूलते हुए संस्कार , एक सामूहिक परिवार के साथ रहने का सुख ,
सब कुछ पीछे छुटता जा रहा है शायद . ...........


धीरेन्द्र मोहन श्रीवास्तव
लखनऊ

दिनांक : ३१ अगस्त २०११
समय : ८.४५ रात्रि